तेरी मेरी बात

क्या कशिश है आँखों में तेरी साहिब
हम रोज़ रोज़ खिंचे चले आते हैं

हम तो बैठे दीदार को तेरे ही
थोडा रुख से पर्दा हटा साहिब

देख कर तुझको मर जी जाएँ चाहे
जिन्दा रहने की नाकाम कोशिश न हो

ये तो इश्क़ तेरा जो लफ़्ज़ों को छु रहा
काश की हम भी कोई लफ्ज़ ही होते

अगर शौक होता तेरे बगैर जीने का
हम तेरे दर पर सजदा करने क्यों आते

हम तो ख़ुशी से मरने को तैयार साहिब
बस कत्ल तू अपनी निगाहों से कर दे

कोई खंज़र भी हो तो मार मेरे सीने में
कि तेरे इश्क़ की मार से तो कम ही होगा

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