विश्वास में हो

क्या छू पाऊँगी

तुम्हें कभी

बहुत दूर हो

ऊँचे आकाश के पार

समुद्र की गहराईओं से गहरे

जल शीतल

फूल से कोमल

पंखों से मुलायम

पर ये सब तो तुमने बनाये

ये तुम्हारा एहसास तो देते

पर क्या तुमसे हैं भी

तुम तो बहुत विशाल

की समा ना सको

किसी सीमा में

और सूक्ष्म इतने

की हर कण कण में

कैसे हो तुम

बोलो

कैसे हो तुम

मुझे देखना है

दिखाओगे अपना रूप

जब तक नहीँ आओगे

इन सबसे ही

एहसास तुम्हारा

आओगे तुम कभी

हाँ आओगे ही

कहता है विश्वास

जिसमे भी तुम ही हो

हो ना

हर विश्वास में हो

सिर्फ विश्वास में हो

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