दीवानगी के आलम
अब तो दीवानगी के आलम हैं साहिब
इश्क़ करो या कत्ल सब कबूल मुझे
अब तन्हाईओं से चुरा लो मुझको
क्योंकि तन्हाइयों में तुझे ही ढूंढती हूँ
जिक्र अब मेरी जुबां पे तेरे बगैर नहीं और है
क्या करूँ मानता नही दिल अपना नही कोई ज़ोर है
छू रही हैं हवाएँ तेरे रुखसार को अब
काश कोई झोंका इधर भी आ जाये कभी
तुम याद तो करते होंगे मुझे कभी न कभी
मुझ जैसे सिरफिरे अक्सर नही मिलते होंगे
क्या कभी तेरी महक मेरी सांसों में होगी
इसको पाने के लिए सांस ही बन्द रखी है
कभी तो हटा दो दरमियाँ के फासले साहिब
तेरा दीदार हो जाए तो इबादत से कम नहीँ
क्यों चाहता है ये दिल की तू मेरा हो
वरना तो आशियाना ही मेरा दिल है तेरा
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