मैं क्या जानू मेरे मोहना

मैं क्या जानू प्रेम क्या मोहना
मैं तो अधम पातकी
मन में नहीं कोई तीव्र वेदना
सेवा नही कोई साध की

नहीं कोई गुण ,अवगुण की ढेरी
तुम बिन कौन सुधि ले मेरी
नाम नही मुख से हरि न बोलूं
होते जगत अपराध ही
मैं क्या जानू........

नहीं कोई त्याग न कोई समर्पण
हूँ अधम नहीं सर्वस्व अर्पण
कब देखूं श्याम नैनों के दर्पण
मन में भरे विषाद ही
मैं क्या जानू........

तुम चाहो तो अपना लो
सेवा में अपनी ही लगा लो
मेरे संग भी नेह लगा लो
संगति मिले कभी साध की
मैं क्या जानू...........

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