तुम ही नज़र में

क्यों तुम ही तुम नज़र आते हो हर और
फिर भी दिल को तस्सली ही क्यों नहीँ

क्यों आ रही महक तेरी हवाओं से मुझे
पर आँखें तुझे देखे बिना मानती ही नहीं

क्यों मदहोश हुई जाती हूँ मय पी कर
क्या तेरी आँखों के प्याले हमेशा से यूँ ही थे

क्यों हटती नहीं नज़र अब रुखसार से तेरे
क्या देखने को और भी है कुछ सिवा तेरे

अब छुपा लो आगोश में अपने ही
की कयामत से तेरा इंतज़ार था मुझको

तू आकर भी न मिले तो कयामत होगी
क्या कयामत से प्यासी रूह पर कयामत होगी

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