मेरी फरियाद

ये तो जिस्म के फनाह होने की बात है
रूह तो तेरी कब से हो चुकी कान्हा

वो दौर और थे तुझे ढूँढ़ते थे कहीँ
अब तेरा एहसास अपने में क्यों है

जब तुम हो मेरे फिर क्यों खोजती हूँ
ये दिलो दिमाग तेरे इश्क़ में गिरफ्तार है

मैं हूँ कौन जल्दी ये समझ नहीं पाती
पर तुम मेरे हो ये भूलती कभी नहीं

कभी मिलना कभी खोना ये दस्तूर इश्क़ के
तन्हाई दर्द और रुस्वाई ये कसूर इश्क़ के

अब मुझे फनाह होने की हसरत है
क्यों बार बार याद आये की मैं हूँ तू नहीँ

है इश्क़ तुझे अगर तो मुझे फनाह कर दे
मिटने को बेताब हूँ आ मुझे तबाह करदे

मैं ही ना रहूँ अब तेरी ही जुस्तजू
तुझसे ही फ़रियाद है तुझसे ही गुफ्तगू

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