महासागर हो
तुम सागर नहीँ
महासागर हो
तुम्हारी शक्ति
आह्लाद् जगाती है
तरंगायित करती है
तुच्छ सी लहरों को
उछाल देती है
जिससे उस महासागर को
आनंदित करती है
उन लहरों को भी
जो उठ उठ
तुमसे मिलतीं हैं
फिर शांत हो जाती
फिर तरंगायित होती
नित नित
नव नव प्रेम से
घुलती मिलती सी
तुम्हारी ही
तुममें ही
मिलती खोती
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