पापों का पश्चाताप

पापों का पश्चाताप हो
पुनः करने पर संताप हो
जो हो हरि कृपा ही
मन में फिर पश्चाताप हो
मिल जाये जब प्रभु शरण
जीवन बने तब ही भजन
जब दृढ मन में विश्वास हो
फिर नित हरि ही पास हों
जब हो मन से संत मनन
लगे प्रेम वाली तब लग्न
जब ह्रदय लगे विरह अग्न
अश्रु लगें जब दृग झरन
व्याकुल जो जब तन मन
देंगे करुणामय तब दर्शन

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