तेरा इश्क़

क्यों ज़िंदा छोड़ा है मरने के लिए
हम तो कबसे मर चुके साहिब

एक एक अश्क़ अब तेरा नाम लेता है
ऐसे रूह की गहराई में उतरे बैठे हो

तेरा एहसास है मुझे कहीं ना कहीँ
फिर भी क्यों ऑंखें तुझे खोज रहीं

नहीं है कोई हुनर की तुम्हें मना सकूँ
फिर लगे की तुम रूठे ही कब थे

यूँ ही अपने दिल को बहला लेते साहिब
तेरा ख्याल क्यों उदास कर जाता है

ये लफ्ज़ तेरे हैँ या मेरे हैं
दिल को अभी तक सवाल घेरे हैं

कोई तारीख़ मुक़र्रर कर अपने आने की
मौत को उसके बाद की तारीख़ देनी है

गर मौत पहले आ गयी तेरे आने से
देख मेरा नही तेरा इश्क़ सहेगा क्या

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