चरणन की दासी

चरणन की अब दासी कीजो
श्यामसुन्दर अब शरण में लीजो

युग युग से ही भटक रही हूँ
विरह पीड़ से दहक रही हूँ
दर्द हृदय का बढ़ता जाए
इस पीड़ को अब हर लीजो
चरणन की.......

तुमसे अपनी क्या व्यथा छिपाऊं
मन मन में ही तुमसे बतियाऊं
अब ना दूर करो मुझे अपने से
योग्य अपनी सेवा के कीजो
चरणन की.......

प्रेम बने मेरी सेवा साधना
प्रेम बने मेरी अब आराधना
और कुछ ना पिया मैं चाहूँ
मोहे अब प्रेम की भिक्षा दीजो
चरणन की..........

Comments