दिल को सुकून

क्यों बहते हो अश्को ज़रा ठहरो
मेरे महबूब को गवारा ना होगा

है उसको मुझसे मोहबत बेइंतहा
ये अश्क़ उसके दिल को चोट देंगे

दफन ही रहो तुम आँखों में मेरी
भीतर ही दिल में उतर जाओ मेरे

जो आँख रोइ तो वो जान लेगा
मुझे आज अपने दिल को रुलाना

जल ही जाए चाहे ये तपिश से
वो भी मेरे दिल को मंज़ूर होगा

नहीं बूँद एक अश्क़ की भी आँख में
मेरे महबूब को कैसे मंजूर होगा

जो दे उसके दिल को हल्की सी ठोकर
मैं उस शै में आग ही लगा दूँ

अगर कोई हसरत रहे उसकी बाक़ी
मैं खुद अपने दिल की हसरतें मिटा दूँ

ये भी तेरे इश्क़ का ही जुनून है
की देखूं तुझे तो कुछ दिल को सुकून है

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