ek pati
एक पाती कान्हा के नाम की
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कब से पुकारती हूँ
लगता है
सुने ही नहीं
या मेरी आवाज़ नही आई
पर तुम तो सुनते हो
अनकही भी
क्या प्रेम है मुझसे
सोचती हूँ
तुम तो करते हो
मुझे क्यों नहीं
तुम्हारे जैसा
क्यों मन भटकता है
व्यर्थ संसार की बातों में
तुम हटा क्यों नहीं देते
तुम मिले हो या नहीं
सुनते हो या नही
तुम हो कहाँ
कभी हर जगह
कभी कहीँ भी नहीं
तुम समझ में क्यों नही आते
आ भी नही सकते शायद
तुम समझ से परे हो
किसी साधन से भी परे
केवल प्रेम से मिलते हो
क्या मैं प्रेम करती हूँ तुमसे
तुम करते हो
क्यों वहीं आकर बात रुक गयी
अब बता भी दो
मेरी समझ से बाहर है
बाँवरी हूँ ना
तुम्हारी बाँवरी
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