यूँ तो
यूँ तो निकले ही नही तुम कभी जहन से मेरे
क्यों चाहती हूँ की तुम और याद आते रहो
गा नही सकी प्यार का कोई नगमा कभी
दिल में है अरमान तुम मुझको सुनाते रहो
ना उठा एक भी कदम तेरे दर को कभी
बस इसी आस में बैठी हूँ की तुम आते रहो
आ रही है खुशबू तेरी हर और से अब
मेरी सांसो को तुम यूँ ही महकाते रहो
ना जाना एक बार जो दिल में बस गए तुम
रूह बन कर ऐसे मुझमे ही समाते रहो
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