क्या से क्या
तुमने मुझे क्या से क्या कर दिया
अपने ही इश्क़ में फनाह कर दिया
जल गया वजूद सब इश्क़ में तेरे
आबाद करने को यूँ तबाह कर दिया
तुमने मुझे.....
नादान नहीँ था यूँ तो अक्लमंदों में था
पर इश्क़ तेरे ने सिरफिरा कर दिया
तुमने मुझे......
ऐसा रोग लगा मुझे इश्क़ का तेरे
और तूने अपना नाम ही दवा कर दिया
तुमने मुझे........
होती है गिनती अब काफिरों में मेरी
मुझे मेरी दुनिया से जुदा कर दिया
तुमने मुझे.......
तू जो कहे बात सब मंजूर है मुझे
राज़ी मुझे अपनी रज़ा कर दिया
तुमने मुझे........
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