तुम पर यकीन
मुझे तुम पर तो यकीं है
खुद पर यकीं नहीँ है
तुम्हें इश्क़ जैसा मुझसे
मुझे तुमसे क्यों नहीँ है
तेरी कितनी इनायतें है
मेरी बस बगावतें ही
तेरा काम मुझको चाहना
मेरा ऐसा क्यों नहीँ है
क्यों मुझसे दूर हो तुम
शायद नहीँ हूँ काबिल
तुमसे ही होगा मुमकिन
मेरे बस में कुछ नहीँ है
या तो मुझे मिटा दो
चाहे आग में जला दो
मेरी इक ही तड़प है बस
तेरा दीदार क्यों नहीँ है
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