इतनी इनायतें तेरी

इतनी इनायतें तेरी कैसे करूँ बयां
करता है रोज़ जादू इश्क़ नयां नयां

नहीँ थी काबिल इतनी की सजदा करना आये
ये तो तेरा करम है काबिल मुझे बनाये
अब नाम लेते तेरा ही थकती नहीँ जुबां
इतनी इनायतें तेरी.......

तेरे इश्क़ का असर है तुझको ही याद करना
तेरे दीदार को तड़पना मिलने की फरियाद करना
यूँ तो हर और देखती हूँ बस तेरे ही निशां
इतनी इनायतें तेरी......

क्या मेरी आरज़ू ये कभी नही होगी पूरी
तेरे बिना लगे अब क्यों जिंदगी अधूरी
क्यों फासले हैँ ये सारे तेरे मेरे दरमियां
इतनी इनायतें तेरी....

या तो इक बार कह दो इश्क़ नही है मुझसे
फिर ना हम कहेंगे कोई भी बात तुमसे
फिर भी ये आग होगी ना होगा मेरा निशां
इतनी इनायतें तेरी...

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