नाथ अब किरपा कीजो
भगवान को सखा भी अति दुर्लभ होय
या पर होय वाकी कृपा सखा बनानो होय
खेले कूदे शाम संग वासे रूठना होय
उनकी करें बराबरी ह्रदय लगावे सोय
सुख वाके में रहे सुखी लग्न यही बस होय
शाम नहीँ जगदीश्वर सखा सखा ही होय
धन धन गोप ग्वाल जिनके सखा बन आए
पूर्ण परब्रह्म भी आनंद ब्रज में पाए
गोपालों की आँगन में कीच में लथपथ होय
ब्राह्मणों के यज्ञ में प्रकट कैसो होय
सुनकर गोप पुकार ही दौड़े दौड़े आये
कोटि कोटि स्तुतियाँ भी मौन ही सह जाये
चाकरी नित नित ही गोप गवालिनो की होय
प्रेम से ही प्रभु मिले प्रीत चरण कमल में दोय
प्रेम रस बरस रहा नव नव भक्तन दिये भिगोय
मुझ पतित पर भी कृपा की नाथ अब दृष्टि होय
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