और कितने इम्तिहां

की तुझे चाहना अब जूनून हो चला
कैसी ये कशिश है तेरे मेरे दरम्यां

सुलग रही हैं हसरतें पिघल रहे हैं हम
मिट रहे हैं सब चिलमनो के निशां

ऐसे ही गुज़र चली थी मेरी जिंदगी
दूर दूर तक ना थे मोहबतों के निशां

वादीआं अब और सर्द हुई जाती हैं
तेरे आगोश में मिल जाए बस पनाह

जल रही हूँ फिर भी आग है प्यास है
बह रहे हैं अश्क़ उड़ रहा है धुआं

अब तो सब्र होता नही यार मेरे
और कितने लोगे बोलो मेरे इम्तिहां

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