जाने क्यों अधरों पर

जाने क्यों अधरों पर नाम नहीं आता तुम्हारा
जैसे तुम भीतर ही तो हो
ऐसे घुले से क्या कहूँ
रोम रोम में तुम ही भरे हो
फिर भी हृदय के ये तार
तुम्हारा ही संगीत गुनगुनाते
वाणी मूक सी हो चली
इस मौन में कुछ शेष रहता है
तो वो हो तुम
क्यों उस पुष्प को देख फिर तुम्हारी ही स्मृति हो उठती
ये पक्षियों का कलरव
आहा !
देखो तुम्हारे ही गीत सुना रहे मुझे
मंदिर की घण्टी का वह नाद
फिर तुम्हारी ही स्मृति करवाता है
ये ढोलक की थाप
इसका हर स्पंदन जैसे
जैसे मेरे हृदय पर हो रहा
ये झाँझ मंजीरे सब
सब तुम्हारा नाम ले रहे
परन्तु
मेरे अधरों पर फिर भी
तुम्हारा नाम न आया
मौन सी होकर
सुन रही हूँ तुम्हें
सुन रही हूँ .......

Comments

Popular posts from this blog

भोरी सखी भाव रस

घुंघरू 2

वृन्दावन धाम की महिमा