नित्य मेरा हृदय प्रकाशित
नित्य मेरा हृदय प्रकाशित है तेरे प्रेम की बाती
आज से मोहना तुझे लिखूँ मैं नित्य एक प्रेम पाती
कभी विरह की पीड़ से व्याकुल कभी प्रेम उमंगें
नित्य मेरे हृदय में उठती रहती नवल प्रेम तरंगें
नित्य नित्य नवल रूप धरता मोहन प्रेम हमारा
प्रति क्षण वर्धमान होय ऐसा प्यारा प्रेम तुम्हारा
हृदय की कलम से लिखूं प्यारे हृदय के कुछ भाव
हृदय हो जाये प्रेम विभोर यही मन मेरे का चाव
मेरी किसी भी चेष्ठा से तुम्हें सुख हो प्रियतम
मैं तो हूँ बस दासी तुम्हारी तुम चाहो जो प्रियतम
नित्य नवीन चाहूँ सुख तुम्हारा हृदय से लिखूँ पाती
पुनः पुनः मेरे हृदय में प्रियतम यही कामना उठती जाती
कभी पत्र पर लिखा सँदेसा कागा कोई सुनाये
कभी पवन रस स्पर्श अपने से मेरे हृदय की बात बताये
मेरी पाती तुम नित्य पढ़ना मेरे मन कर मीत
नित्य पवन में लहराए हमारा मधुर प्रेम संगीत
नित्य हृदय हो झंकृत तुम्हारा नित्य नयी हो भोर
प्रियतम मेरे रहूँ मैं तुम्हारे प्रेम में नित्य विभोर
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