दर्द का इलाज़
दे दो दर्द का इलाज़ मुझे
और कितने इम्तिहान बाक़ी हैं
दिल तो लूट ही चुके हो साहिब
क्यों इस जिस्म में जान बाक़ी है
देख ले दिल पर मेरे जख्मों को
चोट गायब है फिर भी निशान बाकी है
रुक चुकी हैं आँधियाँ अश्कों की
आहों के अब भी तूफ़ान बाक़ी हैं
घर तो तेरे ही रहना है सनम मुझको
जिस्म का क्यों मकान बाक़ी है
मिटा दो दूरी कभी और कितना सब्र करूँ
क्यों ये पर्दे तेरे मेरे दरमियान बाक़ी है
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