रो रही गौ माता

रो रही तेरी गौ माता
रो रही जननी तेरी
प्रेम भरी स्नेह भरी थी
जो रही मांस की ढेरी

रक्त बह गया चार चुफेरे
देख उस खून की लाली है
जो भी काम किये हैं तूने
मानवता को गाली है

धन दौलत ही सब जीवन है
रिश्ते नाते स्नेह कुछ नहीं
घास खा अमृत दिया है जिसने
तुझको अब कोई नेह नहीं

तुझको चाम प्यारी है उसकी
जिसकी रज मस्तक लगानी थी
जिसकी सेवा में कुछ पल भी
तुझे ज़िन्दगी बितानी थी

बीत तो रही ज़िन्दगी तेरे अब
कत्ल में खून खराबे में ही
माँ को भी है घर से निकाला
तुमने उसके बुढ़ापे में ही

देख गौ माँ तेरी की हालत
गली गली क्या खाती है
नहीं रहेगी धरा पर मानवता
गौ खून के आंसू बहाती है

मत समझो इसे कवि की कल्पना
जीवन की ये सच्चाई है
जब तक गौ है धरती पर ही
ये मानवता बच पाई है

जिस दिन गौ और सन्त का
अस्तित्व नहीं रह जाएगा
काम्प् उठेगी धरती कुछ ऐसे
महाप्रलय हो जाएगा

उठ अभी कुछ समय शेष है
जो बिखरा अब सम्भल जाएगा
अभी समय भी गया हाथ से
समय खोकर तू पछतायेगा

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