रसराज
वो सिंधु
बह रहा
पल पल
अमृत से भरा हुआ
छलकता हुआ
सबको अमृत से भरता हुआ
पर ये क्या
इस सिंधु को
भी प्यास
प्यास
एक बिंदु की
भर रहा
उतर रहा
एक एक बिंदु में भी
इसकी यही जाने
सिंधु कैसे बिंदु में
फिर सब बिंदुओं को
अपने में ही समा लेता
ये सिंधु
रस सिंधु
ये रसराज
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