मैंने तो झूठ ही

मैंने तो झूठ ही कह दिया आपको
और आप ऐतबार कर बैठे हो
झूठ मक्कारी ही फितरत मेरी
यकीन आप सरकार कर बैठे हो

देने को बेहिसाब दिया है अपने
और यहां गिनने की फितरत मेरी
जो बेहिसाब नवाजते चले गए
उसे भूलना हुई आदत क्यों मेरी

ए मेरे खुदा इतनी रहमतें न बख्श मुझे
नहीं काबिल कभी गुनाह देख मेरे
नहीं इश्क़ कोई नहीं इबादत मेरी
कब काबिल हूँ बता दो मैं तेरे

वो कोई और ही होंगें जो रात दिन सजदा करते
तुमने भूल तो नहीं की देखने में कभी
मुझको एहसास है गुनाहों का अपने
तुमने बख्शने में कमी की नहीं कभी

किस मुँह से कहूँ दीदार दो मुझको
मुझे तो आँख भर देखना भी नसीब न हो
कहीं दाग ना लगा बैठूं दामन में तेरे
ए खुदा तू मेरे इतने करीब ना हो

हाँ डरती हूँ गुनाहों से अपने ही
मुझमें कहाँ कोई हुनर इबादत का
देखा है इश्क़ आपका ही सरकार
पल पल मुझ पर बरस रही इनायत का

अब तो अलफ़ाज़ ही नहीं क्या लिखूं तारीफ तेरी
वो भी कोई लफ़्ज़ों और गीतों की मोहताज़ नहीं
देखी दुनिया बड़ी मुद्दत से मैंने सारी
मेरी सरकार सा कोई और सरताज़ नहीं

श्यामाश्याम सरकार की जय

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