जगति कौ कीच

हरिहौं हम जगति कौ कीच

कौन विध प्रेम अंकुर हिय फूटै कौन विध होवै सींच

नाम भजन क्षनहुँ रुचै नाँहिं हिय रमावै भोगन बीच

बाँवरी पतिता जन्म जन्म की रही नीचन सौं नीच

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