मेरी इबादतें

मेरी इबादतें क्या रंग ला रही है
तेरी रहमतों का इज़हार ला रही हैं

क्यों गायब हो रही शिकायते सभी
तुझमे खोने का ही एहसास करा रही हैं

सर झुकता था पहले इबादत में तेरी
अब मेरी मैं को ही तेरे आगे झुका रही हैं

लफ़्ज़ों में शिकायतों की बात नही
मोहबतों का अब रस बरसा रही है

कभी ढूंढती थी तुझे निगाहे मेरी
अब तेरा दीदार हर शै में पा रही हैं

तेरी मोहबतों के पैगाम भी अब
लौट के मुझको फिर सुना रही हैं

हो रहा है यक़ीन अब तेरे आने का
मेरी रूह  तेरी होती जा रही है

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