मैं पापी

सुना है रीझ जाते हो
कभी तुम इक अदा पर ही

मुझमे ऐसे कोई भाव नही
तुमको रिझा न पाऊ तो मैं क्या करुँ

ना वाणी में मिठास भरी
क्या गाके तुम्हें सुनाऊँ हरि

तुम झूठे बेर भी खाते हो
एक बार बुलाए आते हो

मेरे मन से उठे पुकार नही
क्या मेरा सच्चा प्यार नही

मेवे छोड़ के छिलके खाते हो
याद करने से तुम मिल जाते हो

मैं मुर्ख कपटी अभिमानी हूँ
करती अपनी मनमानी हूँ

अब भी न तुम्हे मना पाऊँ
तुमको ना रिझा पाऊं तो मैं क्या करुँ

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