सहज कौन
*सहज कौन*
*हमारे युगलकिशोर*
श्रीवृन्दावन श्रीवृन्दावन श्रीवृन्दावन !!!
वास्तव में यदि सहजता, मधुरता, कोमलता, करुणता, सौंदर्यता, सुगन्धि, लावण्यता, प्रेम, रस, रूप की तलाश उठे तो उनकी पूर्णता हमारे युगलकिशोर हमारे *श्रीश्यामाश्याम* हैं। सहजता के अर्थ है अप्राकृत मधुता, प्रारंभिक बिंदु ।जड़ीय जगत में सहजता के सम्पूर्ण अभाव ही है। यहाँ सहजता स्वाभाविकता न होकर केवल उसका मण्डन ही सम्भव है। भोग विलास और जड़ता के गहरे आवरण जीव की वास्तविक सहजता को आवरत कर देते हैं। जबकि जीव उसी परमप्रेम का , उसी मधुरता का एक कण रूप है। वहाँ से छूटते ही असहजता आरम्भ हुई, क्योंकि मूल में वह उस प्रेम सिन्धु का ही एक बिंदु है, परन्तु वहाँ से छूटते ही असहजता से भरता चला जाता है।जब भी जीव ने रस प्राप्त किया है, कोमलता से , सहजता से, दैन्यता से ही प्राप्त किया है।
अपने मूल स्वभाव *श्रीयुगलकिशोर दास्य* की विस्मृति ही असहजता की ओर पलायन करती है। शिशु रूप में जीव अपनी सम्पूर्ण कोमलता सम्पूर्ण सहजता लिए हुए ही आया था।सहजता अपने मूल स्वभाव की ही प्राप्ति है।सहजता के सर्वोच्च शिखर श्रीयुगल प्रेम है, सहजता में ही प्रेम उतर सकता है क्योंकि यही वास्तविक स्वरूपः है। जीव में अपने मूल से छूटने पर रुदन फूटे तो वह सहज हो सके, अन्यथा प्रेम पथ की ओर निहार ही कौन पावै।
सहजहिं सुन्दर युगल किशोर।
अंजन बिनु ति अँखियाँ कारी, चितवनि में चित चोर।।
चिक्कन चिकुर फुलेल बिना सखि, कारे घन घुंघरोर।
पान बिना वर अधर शोणिमा ,मोहति मनुआ मोर।।
बिना महावर पद तल लाली,लखतहिं करति विभोर।
गन्ध बिना दिव देह सुगन्धित, सुख वितरत चहुं ओर।
बिन भूषण बिनु बसन के शोभित,अनुपम अकथ अथोर।
बिनु धोये निर्मल तन-इन्द्रिय,चमकति वितरि अँजोर।
हर्षण रस मय राम सिया दोऊ, परिकर जन रस बोर।
पूरा सुनियेगा।जय जय श्रीश्यामाश्याम।
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