क्यों
दिलों से खेलना तो आदत है तुम्हारी कबसे
यूँ खेलना था तो हम से दिल लगाया क्यों
जानते हो हम अब नहीं रह सकते तुम बिन
यूँ छोड़ना था तो फिर पास ही बुलाया क्यों
जानते हो सब गुजरती है क्या इस दिल पर
तुम चले जाते हो हमसे दो लफ्ज़ कहकर
सच यह है कि हम काबिल ही न इश्क़ के
यह गीत हमको मोहबत का फिर सिखाया क्यों
ख़ामोश भी तो नहीं होने देते मेरे लफ्ज़ों को
हाँ आज बहने ही दो आंखों से इन अश्कों को
डूबता ही छोड़ देते अश्कों के समन्दर में हमको
पल दो पल देकर खुशी ऐसी फिर हँसाया क्यों
हाँ हम भी जी लेंगें जैसे तुम चाहते हो बस
हमको तो अश्कों की बरसातों में भीगना है
भर दो दामन मेरा अब मेरे ही अश्कों से
भीगा सा रहने दो यह दिल सुखाया क्यों
जाओ तो यह साँसें भी साथ लेते जाना
जो तुम्हारे नाम से ही चलती हैं मुझमें
नहीं दरकार हमको एक पल भी यूँ गुज़रे
मुद्दतों हमने तेरे बिन ही बिताया क्यों
इश्क़ सच्चा हो तो कभी मिट नहीं सकता रूह से
मेरा झूठा ही सही सच्चा तो बस तुम्हारा है
तुम्हीं से सीख कर चाहते हैं तुमको इश्क़ करें
हुनर ऐसा हमें साहिब कहो बताया क्यों
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