पिय बिना सुखसार कहाँ
मन के सूने आँगन में मधुर प्रेम की खनकार कहाँ
शुष्क मरुभूमि सा तप्त है रस की बौछार कहाँ
सन्नाटा है मौन सा इक है कोई नवल त्यौहार कहाँ
विरहणी सा मन व्याकुल है कोई नवल श्रृंगार कहाँ
अश्रुजल से पूरित नैन है कोई मृदुल उपहार कहाँ
आकुलता है क्षण क्षण भारी प्रिय मिलन विहार कहाँ
मन का आँगन कैसे महके पिय बिना सुखसार कहाँ
बाँवरी पीर उठै हिय भारी मनहर बिन उपचार कहाँ
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