कौन वस्त को हिय

जाने लग्यो कौन वस्त को हिय
पाथर भी होतो घस जातो नाम रटत जब पिय
कौन धात को बनो हिय मेरो हाय ऐसो भयो कठोर
बिछुरत पिय सो प्राण रह्यौ शेष और करे यह ठौर
हाय तबहुँ न राख्यो प्राणधन बाँवरी कियो तोहे दूर
प्रेम को कण न होतो हिय रहयों विषयरस चूर

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