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हे रससिन्धु

हे रससिन्धु कीजै दयाबिन्दु, तुमसौं कौन उदार। हे स्वामिनी ललितभामिनी, तुम्हीं करौ सम्भार।। ललिते ललिते ललिते गाऊँ जितने पाऊँ स्वासा। तुम्हरी कृपा तुम्हरी करुणा, राखौं चरणन पासा।। ललित रङ्ग दीजौ छिटकाय , कीजौ आपन चेरी। ललिते ललिते ललिते ललिते, बाँवरी दासी तेरी।।

श्रीललिते

जयजय ललित अनवेषिणी जयजय केलिरहस्या जयजय विलास प्रकाशिनी जयजय केलिगूँथीनि जयजय सहज गाम्भीर्या जयजय ललित संवादिनी जयजय केलि कौतुके जयजय केलि विचित्रे जयजय ललित सज्जिता जयजय पुहुप संवादिनी जयजय ललित स्पंदने जयजय रसीली कौतुके जयजय ललित उत्सवे जयजय प्रेम सुगन्धिनी जयजय ललित सिंधु गामिनी जयजय केलि व्यसने जयजय नवल आन्दोलिनी जयजय पराग स्पर्शिनी जयजय ललित केलि कम्पिता जयजय ललित सचेतने जयजय दिव्य विलासिनी जयजय केलि पुल्किते जयजय ललित मनोरथे जयजय सुरभित श्रीलता जयजय श्रीवन सुवासिनी जयजय सहज विलासिनी जयजय मधुमद तुलिके जयजय पुहुप हिन्डोलिनी जयजय लीला सन्च्या जयजय ललित स्फुरणे जयजय ललित सार स्पंदना जयजय रहस्य मालिके जयजय अनन्त उत्सवे जयजय अनन्त विलासिनी जयजय रसानन्द झारिणी जयजय ललित अवलोकिनी जयजय रसाल माधुरी जयजय नवकेलि चातुरी जयजय ब्रह्माण्ड सम्मोहिनी जयजय ललित तटवासिनी जयजय रहस्य प्रकाशिनी जयजय मदन मनमोहिनी जयजय नवल स्पंदने जयजय आनन्द कन्दिनी जयजय नव रहस्यलता

ललित गान

जयजय ललित अनवेषिणी जयजय केलिरहस्या जयजय विलास प्रकाशिनी जयजय केलिगूँथीनि जयजय सहज गाम्भीर्या जयजय ललित संवादिनी जयजय केलि कौतुके जयजय केलि विचित्रे जयजय ललित सज्जिता जयजय पुहुप संवादिनी जयजय ललित स्पंदने जयजय रसीली कौतुके जयजय ललित उत्सवे जयजय प्रेम सुगन्धिनी जयजय ललित सिंधु गामिनी जयजय केलि व्यसने जयजय नवल आन्दोलिनी जयजय पराग स्पर्शिनी जयजय ललित केलि कम्पिता जयजय ललित सचेतने जयजय दिव्य विलासिनी जयजय केलि पुल्किते जयजय ललित मनोरथे जयजय सुरभित श्रीलता जयजय श्रीवन सुवासिनी जयजय सहज विलासिनी जयजय मधुमद तुलिके जयजय पुहुप हिन्डोलिनी जयजय लीला सन्च्या जयजय ललित स्फुरणे जयजय ललित सार स्पंदना जयजय रहस्य मालिके जयजय अनन्त उत्सवे जयजय अनन्त विलासिनी जयजय रसानन्द झारिणी जयजय ललित अवलोकिनी जयजय रसाल माधुरी जयजय नवकेलि चातुरी जयजय ब्रह्माण्ड सम्मोहिनी जयजय ललित तटवासिनी जयजय रहस्य प्रकाशिनी जयजय मदन मनमोहिनी जयजय नवल स्पंदने जयजय आनन्द कन्दिनी जयजय नव रहस्यलता

जहां बादल

जहां बादल बरसे , वही कोहरा भी छाया था फिर बारिशों के इन्तज़ार में दौर धूप का आया था अजब हैं रङ्ग सारे तेरे मौसम -ए -इश्क के ही कभी बारिश में गीला तो कभी धूप में तपाया था कभी रिसता है बूँदों सा ,नशा बनकर यह रग रग में कभी खामोश सुनती हूँ, कभी तूफान आया था कभी आँखें बरसती हैं ,कभी साँसे तरसती हैं कभी कम्पन थी सर्दी की ,कभी कोहरा जमाया था हूँ आशिक मैं बारिशों की ,बरसते यूँ ही रहना तुम तराश कर एक पत्थर को, तुमने ये नक्शा बनाया था जाने क्या गुनगुनाते हो ,मेरे कानों में अक्सर तुम  तेरे लफ़्ज़ों को नगमों में ,कभी यूँ ही सजाया था

श्रीललिते

युगल सुखकारिणी केलि सम्भारिणी जय जय जय स्वामिनी ललिते रस विस्तारणी रङ्ग बिहारिणी  जय जय जय स्वामिनी ललिते वन आखेटिका नवल संयोजिका जय जय जय स्वामिनी ललिते अनंग विलासिनी विपिन वासिनी जय जय जय स्वामिनी ललिते ललित प्रकाशिनी मुदित विलासिनी जय जय जय स्वामिनी ललिते युगल प्रमोदिनी रस अनुमोदिनी जय जय जय स्वामिनी ललिते कला मुद्रिके सुभग चन्द्रिके जय जय जय स्वामिनी ललिते नित्य षोडशी प्रमुदित अहर्निशी जय जय जय स्वामिनी ललिते नित्यरस मूलिनी परागित फूलनी जय जय जय स्वामिनी ललिते केलि आधारिणी नाद सम्भारिणी जय जय जय स्वामिनी ललिते रस कल्लोलिनी मधुर बोलिनी जय जय जय स्वामिनी ललिते नवल कौतुकी केलि चातकी जय जय जय स्वामिनी ललिते प्रीति संयोजिका केलि केन्द्रिका जय जय जय स्वामिनी ललिते अनंत शोभिणी अनंग लोभिणी जय जय जय स्वामिनी ललिते केलि सम्पुटिका सैज सम्भारिका जय जय जय स्वामिनी ललिते ललित मनुहारिणी क्रीड़ा विस्तारिणी जय जय जय स्वामिनी ललिते केलि पताका युगल विशाखा जय जय जय स्वामिनी ललिते अनंग पूर्णिमा मिलन मधुरिमा जय जय जय स्वामिनी ललिते ललित ज्योत्सना प्रीति सम्पन्ना जय जय जय स्वामिनी ललिते मदमत् सारँगिते...

ललित भीत

युगल सुखकारिणी केलि सम्भारिणी जय जय जय स्वामिनी ललिते रस विस्तारणी रङ्ग बिहारिणी  जय जय जय स्वामिनी ललिते वन आखेटिका नवल संयोजिका जय जय जय स्वामिनी ललिते अनंग विलासिनी विपिन वासिनी जय जय जय स्वामिनी ललिते ललित प्रकाशिनी मुदित विलासिनी जय जय जय स्वामिनी ललिते युगल प्रमोदिनी रस अनुमोदिनी जय जय जय स्वामिनी ललिते कला मुद्रिके सुभग चन्द्रिके जय जय जय स्वामिनी ललिते नित्य षोडशी प्रमुदित अहर्निशी जय जय जय स्वामिनी ललिते नित्यरस मूलिनी परागित फूलनी जय जय जय स्वामिनी ललिते केलि आधारिणी नाद सम्भारिणी जय जय जय स्वामिनी ललिते रस कल्लोलिनी मधुर बोलिनी जय जय जय स्वामिनी ललिते नवल कौतुकी केलि चातकी जय जय जय स्वामिनी ललिते प्रीति संयोजिका केलि केन्द्रिका जय जय जय स्वामिनी ललिते अनंत शोभिणी अनंग लोभिणी जय जय जय स्वामिनी ललिते केलि सम्पुटिका सैज सम्भारिका जय जय जय स्वामिनी ललिते ललित मनुहारिणी क्रीड़ा विस्तारिणी जय जय जय स्वामिनी ललिते केलि पताका युगल विशाखा जय जय जय स्वामिनी ललिते अनंग पूर्णिमा मिलन मधुरिमा जय जय जय स्वामिनी ललिते ललित ज्योत्सना प्रीति सम्पन्ना जय जय जय स्वामिनी ललिते

ललित विलास

जयजय ललित रसजोरि की ललित निहारन ....कैसी अद्भुत रसपगी रसमसी जोरि है री सखी ! दोऊ रसीले रसिया ....इनके अंग अंग में अनन्त अनंग विलास भरे री..... रसीले कौतुक .... रसीली चितवन ... रसीली निहारन .... दिवा रात्रि यह रसीली जोरि रस सिन्धु में ही अवगाहन करती रहती है..... दोऊ बिहारी हैं री यह .... बिहार में भरे .... इनका हृदय उस रस सागर की मीन की भाँति अतृप्त रहवै.... सदा सिन्धु में डूबे रहवै कौ व्याकुल....  निहार री ललित दासी .... ललित नेत्रंन की ललित कोर सौं निहार री ..... निहार निहार के सुख लेय री....और और ललिताई गह्वराई की आशीष देय री इस ललित बिहारिनि जोरि कौ.....यह परस्पर अंस भुज मिलाय मिलाय मिले रह्वैं री..... अपने हृदय रुपी ललित सेज पर इन्हें पौढ़ाए राखो री.... इनका यह विलास ही तो तुम्हारे प्राण हैं..... रसमई बिहारी जोरि कौ ललित बिहार री..... चिरजीवे अद्भुत यह जोरि..... इनकी आरती उतार लेय री.... और और मधुराई बढ़ती रहे.... ललित सुभग सेज ...ललित क्रीड़ा ....ललित श्रृंगार ..... यही गीत गाती रहो री ..... श्रीललिते श्रीललिते श्रीललिते ..... यही नाम तो इनके ललित विलासों का सम्पुट है री .... बिह...

अधरं मधुरं

अधरं मधुरं .....मधुर मधुर .... इतनी मधुरता भरी इन अधरों में ...बहा लिए जा रही यह वेणु ... रव रव मधुर मधुर ....  नयनं मधुरं.... क्या भरा है इन नयनों में .... कहाँ से ला रहे इतनी मधुरता ... अरे भीतर ही समेटे बैठे हो .... मत खोलो इन बड़े बड़े नेत्रों को .... मधुराधिपति ... मधुराधिपति .... वचनं मधुरं ... किसे गा रहे हो .... मधुरता को .... भीतर वही तो है ... मधुराधिपति ...  वचनं मधुरं .. भरे भरे ... झार रहे मधुरताओं को.... चलना भी मधुर मधुर.... यह लचकन ... यह ठुमकन ...  तुम्हारी रेणु भी अति मधुर है .... न होती मधुरता तो क्यों समस्त प्रेमी अपने मस्तक का श्रृंगार बनाते .... ओह .. जिसे स्पर्श करते मधुर मधुर ही करते न तुम ... नृत्यं मधुरं .... मधुरता में ही लासित होकर ऐसी ऐसी मधुर मुद्राएँ हे त्रिभंग लला.... मधुराधिपति .... मधुराधिपति..... यह मस्तक पर मधुर मधुर तिलक ... अहा ... यह पीताम्बरी की मधुर कसन ...   रमणम  मधुरं ....रमणम मधुरं ..... मधुरताओं में ही रमण करते हो ... दृष्टमं मधुरं .... जान गई मैं कहाँ निहार रहे हो .... किसे निहार रहे हो .... कालिन्दी का यह मधुर स...

यूँ तो सुकून

यूँ तो सुकून भी मुझे किराये के मकां सा है  जलता है कुछ भीतर भीतर आँखों में धुआं सा है ऊँगली पकड़ के साथ भी तुमने ही चलाया था  पीछे से चल रही अपनी परछाई सा बनाया था  क्यों मानते हो अब मेरा रस्ता अब जुदा सा है  यूँ तो सुकून...... यह जिंदगी कभी कभी जली ताप के भार सी  कभी बरसती आँख यह कभी रूह पर बौछार सी  बहता है कुछ कभी कभी भीतर दबा सा है  यूँ तो सुकून...... क्यों जगाते हो सोई कलम क्यों आज कुछ भरा हुआ  मुद्द्त से सूखता जख्म क्यों आज फिर हरा हुआ  यह दर्द तो पुराना था क्यों आज कुछ नयां सा है  यूँ तो सुकून...... हर नई आह पर चलो वाह वाह कर लेते हैं  दवात ए इश्क़ में चलो कुछ स्याही भर लेते हैं  इश्क़ का सैलाब कब आँखों में थमा सा है  यूँ तो सुकून भी मुझे किराये के मकां सा है  जलता है कुछ भीतर भीतर आँखों में धुआं सा है

बुरे हम

हरिहों बुरे हम पसु समाना। भोग विषय में धंसे बुरे हम जीवन निद्रा भोग अरु खाना। भजन हीन कूकर सम जीवन भजन बिना कैसे होय निदाना। बाँवरी जन्म जन्म सौँ खोटी सीखी केवल बात बनाना।।

चोरी हो जाने की

कौन हो तुम चोर चोर सिरमौर नवनीत चोर चित चोर चुरा लेते हो न चित मनहर.... कर लेते हो मन का हरण और चुराने के बाद शेष क्या रहता है जो चोरी हुआ वो तो चला जाता है न अपना रहता ही नहीं मन को चुराने वाले तो तुम हो न फिर  मैं क्यों शेष रही क्या तुम चुरा भी न पाए मेरा मन नहीं नहीं  तुम नहीं चुरा पाए फिर चितचोर कैसे....  मनहरण कैसे .... पुनः प्रयास करो न चुराया था तो पूरा ही चुरा लेते अब भीतर व्याकुलता क्यों है अपना ही शेष न रखने की चोरी ही हो जाने की तुम्हारी हो जाने की....

पावस रस

*पावस रसवर्षण* रस वर्षिणी पावसे रस झारिणी पावसे रस संचारिणी पावसे रस प्रफुल्लिनी पावसे रस उन्मादिनी पावसे रस झकोरनी पावसे रस उमगिनी पावसे रस आंदोलिनी पावसे रस सरिते पावसे युगल आमोदिनी पावसे नित्य सहचरी पावसे श्रम बूंदनि पावसे श्रम वारिधि पावसे मधुरितु संयोजिका पावसे युगल विलासिनी पावसे रस वर्धिनी पावसे नवल तरंगिनी पावसे हिय उल्लासिनी पावसे मेघ राषिनि पावसे घन दामिनी संगिनी पावसे घन दामिनी विलासिनी पावसे घन दामिनी उन्मादिनि पावसे घन दामिनी क्रीडिता पावसे नवल विलास रचयिनी पावसे प्रेम पाक रचयिनी पावसे प्रेम रस गूंथिनी पावसे नवल विलास संभारिनी पावसे विलास आलोकिनी पावसे मधु विलास संयोजिका पावसे युगल प्राण आंदोलिनी पावसे सौरभ प्रफुल्लिका पावसे हरिताई वर्धनी पावसे हरित आंदोलिनी पावसे रस सलिते पावसे रस कल्लोलिनी पावसे शुक पिक आमोदिनी पावसे कोकिल प्रफुल्लिनी पावसे मयूर रस तरंगिनी पावसे मधुर रस भरिनी पावसे विलास सुरभिनी पावसे रस सरिते आंदोलिनि पावसे घन दामिनी संगिनी पावसे हरित प्रफुल्लिनि पावसे रसवन प्रफुल्लिते पावसे कुंज वाटिका शीतले पावसे रसघन शीतले पावसे व्याकुल घन संभारिणी पावसे घन मोद वर्धि...

शरणागत कौ प्रतिपार

हरिहौं कूड़ सब ब्यौपार। छांड भजन फिरै जगति बाँवरी बिरथा किये दिन चार।। भोग वासना कल्मष भारी हरि दीन्हीं फिरै बिसार। नेह जगत कौ साँचो मानैं भूली जीवन कौ सार।। हा हा नाथा पकरि कर साधौ ऐसौ बुरो ब्यौहार। अपनौ बल न राखै बाँवरी तुम शरणागत कौ प्रतिपार।।

तुम और मैं

*तुम और मैं* *ईश्वर और जीव* किसके चेहरे में क्या देखूँ यहां चेहरे पर इक चेहरा है इक चेहरा तुझसे मिलता है इक चेहरा मुझसे मिलता है जब तुझसा चेहरा देखती हूं तो सच तुझमें खो जाती हूं जब लगता वो चेहरा अपना तब आँखें बंद कर लेती हूं काश सब देखती मैं तुमसा ही काश सबमें तुमको देख पाती मेरी नज़र भी है मेरे जैसी ही क्यों मुझको ही खड़ा कर पाती तुम ही तुम रहो न नजरों में न तेरे सिवा कोई नज़र में हो गर मेरी नज़र न तुमको देख सके मेरी नजर में अपनी नज़र कर दो अर्थात हर जीव के भीतर परमात्मा का ही अंश है। जब किसी का जीव भाव दृढ़ है वो सब तरफ कमी देखता है , शिकवा शिकायत ही करता है। कभी किसी के गुण दिखते हैं तो वो ईश्वर स्वरूप लगता है और अवगुण देखने वाली यह आंखें मुझसे तुम्हारी ही तो छवि छिपा रही हैं। क्योंकि अवगुणो में आप नहीं दिख रहे तब मेरा स्वयं का जीव भाव नहीं छूट पाता।हे नाथ मेरी यह जीव दृष्टि भंग करदो ताकि चहुं ओर आपका ही विलास निहार सकूं।

भजन करै न नीच

हरिहौं होऊँ जल भरयौ कीच उछल वसन करूँ मलिन ज्यों स्पर्श करो उलीच होऊँ कालिख कोयला की कालिस देऊं रँग हीरा छांड कौन मूर्ख करे कोयला कौ सँग नाम भजन सेवा सौं हीना कहो कोयला कहो कीच बाँवरी पतितन कौ सरदारी भजन करै न नीच

कहानी

आज मेरे लफ़्ज़ भी मेरी कहानी मुक़्क़मल न कर पाएंगे जैसे अधूरी सी है यह ज़िन्दगी भी मेरी बगैर तेरे   उठ रहे हैं बड़े बड़े तूफ़ान आज दिल घर इस समन्द्र में पर मेरे अश्कों का समन्द्र भी मुझे डुबो न सका वादा किया था उसने मुझे इक रोज़ मिलने का  बस उसी इकरार पर यह चंद सांसे हरकतें करती बड़े आज करदो ख़ामोश तुम्ही उठते इन तूफानो को मुझसे मेरी साँसो का बोझ अब नहीं उठाया जाता

पीर की कलम

निर्बल के बल तुम्हीं राम भटकत फिरत ठौर ठौर सब तुम्हरे चरण विश्राम जन्म जन्म पाप कौ बोझा किस विध नाथ उठाऊँ नाम विहीना फिरै जगत बांवरी भजन ध्यान न लगाऊँ हा हा नाथ व्यथा यह मन की तुमको टेर सुनाऊँ  काहे चरणन दूर करो हो एक स्वास नहीं पाऊँ

अग्नि थम न जाये

हाँ बहुत छोटे से पँख हैं मेरे छोटी सी मेरी उड़ान न छु पाऊँ परछाई तुम्हारी अपनी व्यथा का मुझको भान कितनी दूर रहते हो मुझसे कैसे तुम्हारा स्पर्श करूँगी तरस गई यह ऑंखें मेरी कैसे तुम्हारा दर्श करूँगी यही पीड़ा प्राण हरण करे बस सब भांति यह दासी अयोग दरस परस सेवा मिले किस दिन कब आवे यह शुभ संयोग चलो रखो यह अग्नि सुलगती हिय की पीर कहीं जम न जाये न हो अश्रु की बरसातें प्रियतम यह अग्नि कहीं थम न जाये

निर्बल के बल

निर्बल के बल तुम्हीं राम भटकत फिरत ठौर ठौर सब तुम्हरे चरण विश्राम जन्म जन्म पाप कौ बोझा किस विध नाथ उठाऊँ नाम विहीना फिरै जगत बांवरी भजन ध्यान न लगाऊँ हा हा नाथ व्यथा यह मन की तुमको टेर सुनाऊँ  काहे चरणन दूर करो हो एक स्वास नहीं पाऊँ

करत हो ऐसी बतियाँ

काहे करत हो ऐसी बतियाँ और कोई देवी देव न जानू काहे भेजत हो पतियाँ नाम तुम्हारा काहे भुलावो करूँ केलि कौ गान पुनि पुनि काहे भटकावत बांवरी किस विध करे ध्यान हा हा नाथा छुटवाओ सब विरथा भोग जंजाल भजन नाम छुटवावे क्षण भर करो दूर तत्काल