जहां बादल

जहां बादल बरसे , वही कोहरा भी छाया था
फिर बारिशों के इन्तज़ार में दौर धूप का आया था

अजब हैं रङ्ग सारे तेरे मौसम -ए -इश्क के ही
कभी बारिश में गीला तो कभी धूप में तपाया था

कभी रिसता है बूँदों सा ,नशा बनकर यह रग रग में
कभी खामोश सुनता हूँ कभी तूफान आया था

कभी आँखें बरसती हैं ,कभी साँसे तरसती हैं
कभी कम्पन थी सर्दी की ,कभी कोहरा जमाया था

हूँ आशिक बारिशों का मैं, बरसते यूँ ही रहना तुम
तराश कर एक पत्थर को, तुमने ये नक्शा बनाया था

जाने क्या गुनगुनाते हो ,मेरे कानों में अक्सर तुम 
तेरे लफ़्ज़ों को नगमों में ,कभी यूँ ही सजाया था

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