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फिरसे आज अश्कों का

फिरसे आज अश्कों का सैलाब आया है न बहो न बहो जाने कितना इन्हें मनाया है एक एक कतरा अश्कों का दर्द देता है उनको दिल भी बेबस सा हुआ न कुछ कर पाया है फिरसे आज ..... बड़े बेबस से रहे हम खुद पर नहीं काबू जैसे रँग अपना नहीं बस कोई और ही रँग छाया है फिरसे आज...... कर करके वादे अब तलक बहुत तोड़े हैं हमने थामते थामते अश्कों को कलम ने गाया है फिरसे आज ...... अब खुद से ही छिप जाने की ख्वाहिश बाकी है जो ना पास था पास कभी मुद्दत से यूँ दिखाया है फिरसे आज..... चलो खामोश करदो मुझको और यह कलम मेरी मेरी ही बेवफ़ाइओं का ज़िक्र अब तलक गाया है फिरसे आज..... देखो अब जुबाँ पर तेरा नाम भी नहीं आता है जो तुमको खोया फिर इस जहाँ में क्या पाया है फिरसे आज.....

आज भी....

 आज भी.... आज भी रात जाएगी बस आँखों में रो रहा है दिल पर इन आँखों में कोई अश्क नहीं  बह रहे थे जो मुद्दत से मेरी आँखों से आज मेरे अश्क़ भी छोड़कर गए मुझको  न तो ज़िन्दा हूँ न अब तलक मौत आई न तुम मिले न तुमसे मिलने की उम्मीद गई माना काबिल नहीं हूँ साहिब इश्क़ के अब तलक इश्क़ तुम हो हमने यह बात चलाई ही नहीं जाने क्या उतर रहा है आज इन लफ़्ज़ों में अपनी बातें यूँ खुलेआम लिखाया न करो चलो नहीं माँगती तुमसे इन बेचैनियों का हिसाब हो दवा तुम ही तुमसे से तुमको नहीं मांगा मैंने

चाहती हूँ तुमसे

 चाहती हूँ तुमसे... थोड़ा सा दर्द कुछ अश्क दे दो मुझे आज जीने का बहाना चाहती हूँ तुमसे मरना आसान है मुश्किल है जिंदा रहना चन्द सांसों की मोहलत चाहती हूँ तुमसे दे दो रिसते हुए से थोड़े ज़ख्म तोहफ़ा सिसकियों का नज़राना चाहती हूँ तुमसे कर दो इतना खाली कि भीतर तुम ही रहो रूह के मालिक रहो इतना चाहती हूँ तुमसे हूँ कुछ बेचैन सी पर मुझको न थोड़ा चैन मिले यही इश्क़ की बेचैनियां चाहती हूँ तुमसे न देना मौत बस सुलगती सी ज़िन्दगी देना नहीं दवा बस सिर्फ दर्द ही चाहती हूँ तुमसे कतरा कतरा मेरे लहू का बस पुकारे तुम्हें मेरी खामोशी भी पुकारे इतना चाहती हूँ तुमसे

बस तुम

बस तुम और क्या लिखूँ जो तुम जानते ही न हो दिल में रहते हो पर मुझसे छिपे रहते हो जानते हो बात सब बिना ज़ुबान से कहे छिप छिप कर दिल में ही कहते रहते हो इक नज़र भर देखने को है प्यासी यह आँखें खेल मुझसे छिपने छिपाने के खेलते रहते हो चलो मैं न बिक पाई पर तुम खरीद लो मुझको हो सौदागर इश्क़ के तुम सौदे करते रहते हो पढ़ लो इक बार मेरी आँखों में भी चेहरा अपना मेरे होकर भी मुझसे क्यों अजनबी रहते हो सच है अब सम्भलती नहीं मेरी धड़कनें मुझसे बनकर अरमान मेरी रूह में मचलते रहते हो क्या छिपाया है बोलो मैंने तुमसे हाल ए दिल तुम ही लिखवाते हो और तुम ही पढ़ते रहते हो

तुम क्यों हो

तुम क्यों हो... यह जो बेचैनी सी छाई है रूह पर मेरी चलो बताओ कि इतने बेचैन तुम क्यों हो कहाँ चली गई हैं नींदें मेरी आँखों की चलो बताओ कि इतना जागते तुम क्यों हो मैं तो खामोश सी रही हूँ बड़ी मुद्दत से चलो बताओ मेरी कलम से लिखते तुम क्यों हो है तो ज़हर से भी कड़वा मिज़ाज मेरा चलो बताओ इतना मीठा बोलते तुम क्यों हो सच है नहीं काबिल थी इश्क़ के मैं कभी चलो बताओ मुझसे इतना इश्क़ करते तुम क्यों हो कहाँ जाकर मुक्कमल होगी यह तलाश मेरी चलो बताओ मेरे ही दिल में छुपते तुम क्यों हो

सुन लो

सुन लो चलो आज हिसाब लो मुझसे मेरी मोहब्बत का तेरे हिस्से में सारा इश्क़ मेरे हिस्से बेवफाई आई जानती हूँ तेरे ही अश्क बहते हैं मेरी आँखों से एक एक अश्क में कैसे इतनी तरावट आई क्यों चलती हैं मेरी साँसे बिना पुकारे तुझे सुनते हैं कि इश्क़ में इक साँस न खाली आई  सुना है इश्क़ में बाकी वजूद नहीं रहता कोई आईने में क्यों मुझे नज़र मेरी तस्वीर आई नहीं नहीं नहीं अब तलक कोई इश्क़ हुआ मुझको अब तलक नहीं इस रूह पर इश्क़ की बेचैनी छाई अब बरस जाओ इस बंजर सी जमीं पर बादल होकर सुलगते से इन जख्मों की बन जाओ तुम्हीं दवाई

कैसे

कैसे ......... मुद्दतों से थमी थमी सी थी ज़िन्दगी मेरी अब उठते यह इश्क़ के तूफान संभालूं कैसे यह भी सच है कि फलसफा ए इश्क़ समझी नहीं तुम जी कहो कायदे इश्क़ के निभा लूँ कैसे सुना है बहती हुई नदियों का रुकना ठीक नहीं नहीं हिम्मत फिर इन लहरों को उछालूं कैसे रोज ही इक इक चिराग बुझता है मेरी महफ़िल का बढ़ते हुए अंधेरो को रोशनी में सजा लूँ कैसे  दिन ब दिन टूटता ही जाता है सब्र इस दिल का नहीं बस में मेरे यह कम्बख़्त मना लूँ कैसे चन्द परदों में छिपा रखे हैं हालात ए दिल अपने तू ही बता इक झटके में इन्हें हटा लूँ कैसे मैं तो खामोश हूँ जाने भीतर कौन उछलता रहता है दर्द ए दिल फिर अपनी जुबां से मैं गा लूँ कैसे मेरा मर्ज़ तू ही बस तू ही दवा है मेरी इतना मीठा है दर्द ए इश्क़ छुड़ा लूँ कैसे