भूल जाएं वजूद अपना तेरे इश्क़ की गलियों में यही आँखें देखे सपना तेरे इश्क़ की गलियों में तेरे इश्क़ की बस्ती साहिब बड़ी दूर बस रही है बड़ा मुश्किल हुआ चलना तेरे इश्क़ की गलियों मे...
एक और तूफ़ान दिल मे दबा कर लौटे हैं मरे हुए तो मुद्दत से थे लाश उठाकर लौटे हैं खेली है होली हमने अपने ज़िगर के लहू से ही बेरंग सी ज़िन्दगी को एक रँग रँगाकर लौटे हैं जाने क्यों मुझम...
*श्रीगौर लीला रस तरंगिणी* 6 *गौरसुन्दर का शयन* गौरहरि एक बड़े पलँग पर शयन कर रहे हैं। स्वामिनी बिष्णुप्रिया जी उनके कक्ष में विराजमान हैं।संध्या अभी हुई नहीं है...