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जयजय राधावल्लभ लाल

जय ललिते जय नवल श्रृंगारिणी जयजय राधावल्लभ लाल जय मद भरणी जय प्रीति सुगन्धिनी जयजय राधावल्लभ लाल जय रसिक प्राणा जय परम रसिकिनी जयजय राधावल्लभ लाल जय वृन्दावन सर नवल कुमुदिनी जयजय राधावल्लभ लाल जय कोक कला निपुणे मनभाविनी जयजय राधावल्लभ लाल जयजय वल्लभ हिय राजिनी जयजय राधावल्लभ लाल

तो कैसे

कभी उतरो मेरे लफ़्ज़ों में बात  कहो दिल की लिखूँ तो कैसे.... जाने क्या हाल दिल की दिल को ही न पता है हाल ए दिल भी दिल से पूछूँ तो कैसे..... कुछ सुलगता सा है भीतर जाने कुछ बहता सा नहीं अब जुबाँ पर आता कहूँ तो कैसे..... सच है कि काबिल ए इश्क़ हम मुद्दत से नहीं थे इस इश्क़ की चाशनी में मिलूँ तो कैसे..... नहीं काबिल इतनी साहिब मैं तुम को दिल मे रखलूँ और खुद तुम्हारे दिल में रहूँ तो कैसे..... ज़रा मुझको तड़प देना इस इश्क़ की कोई सुलगन पत्थर सा हो चुका दिल तड़पूं तो कैसे..... न कोई खुशी है न ही गम रहा कोई बाकी अब जाने यह कैसा मन्जर कुछ कहूँ तो कैसे......

काश

काश बहने देते थोड़े अश्क़ और  इन अश्कों में ही सारा दर्द बह जाता कलम भी उस मोड़ न उठाई हमने चुभता सा नासूर लफ़्ज़ों में रह जाता खामोश भी होने न दिया इस दिल की लगी ने उठते से तूफान को भी यह दिल सह जाता न होते हम यूँ शर्मिंदा अपनी हरकत पे  कुछ तो था जो दरमियाँ हमारे रह जाता

क्यों हम

कितना जलता है यह दिल हमसे पूछो जल जल भी कोयला न हुए क्यों हम ज़िंदा रहने का कोई शौक़ ही बाकी न रहा तिल तिल मरते हुए भी खामोश न हुए क्यों हम खामोशियों का सिलसिला ही भा रहा था हमको लफ्ज़ क्यों मिले आज फिरसे लिखे क्यों हम न बोलो न बोलो इक लफ्ज़ भी भारी है आज हल्की सी हरक़तों से हल्के ही हुए क्यों हम दिलजलों को अब कौन मुँह लगाता है साहिब दिल तो जला ही अबतक न जले क्यों हम मेरे लिखे हुए सब लफ्ज़ भी मिटा देना तुम थोड़ा थोड़ा मिटते फिर भी न मिटे क्यों हम

कसूर मेरी नज़र का

सब कसूर मेरी नज़र का ही.... क्यों  तुम्हें निहारती नहीं क्यों  तुम्हें पुकारती नहीं क्यों  इनकी तलाश कुछ और ही क्यों इनका अंदाज कुछ और ही सब कसूर मेरी नज़र का ही..... क्यों  इन्हें कुछ और लुभा रहा क्यों इन्हें कुछ और बुला रहा क्यों इनमें कुछ और समा रहा क्यों इनका अंदाज़ कुछ और ही सब कसूर मेरी नज़र का ही..... क्यों मुझसे कुछ मेरा छूटता नहीं क्यों हर झूठा रिश्ता टूटता नहीं क्यों इस रूह को तेरी तलब नहीं इनका अंदाज कुछ और ही सब कसूर मेरी नज़र का ही....

भोग विषय

हरिहौं भोग विषय दिन बीते नाम भजन की रीति बिसरी भांड रह गए रीते बिरथा गमाई स्वासा स्वासा दिन जितने भी बीते धिक धिक जीवन ऐसो बाँवरी क्षणहुँ लगी न प्रीते

तेरा ही इश्क़

अश्कों की बरसात रुकती नहीं आज जाने क्यों क्या मेरी आँखों से तेरा ही इश्क़ बहता है मैं तो होकर भी न रही जाने क्यों अब मुझमें मुझमें अब ज़िंदा भी तेरा ही इश्क़ रहता है मेरे दिल में धड़कती यह धड़कनें तुम्हारी ही अपने ही दिल में तुमको धड़कता पाती हूँ हैरान हूँ साहिब तेरा इश्क़ देख देख कर मैं खामोश सी इन बरसातों में भीगती जाती हूँ लफ्ज़ भी खो चुके मेरे कहीं बड़ी मुद्दत से एक अरसे से खामोशी को हमने ओढ़ लिया बस तेरी ही कहानियाँ सुनते सुनाते हुए हमने तेरे इश्क़ से ही बस अपना रिश्ता जोड़ लिया  जाने क्या दबा है इस लंबी सी ख़ामोशी में हमारी जो पिघल पिघल आज आँखों से मेरी बहता है नहीं मुझे अब तलक इश्क़ न हुआ न हुआ तुमसे तेरा ही इश्क़ बस अब रग रग में मेरी बहता है